Monday, June 9, 2008

चिराग - ऐ - महफिल

किश्त दर किश्त, गम
मिलता है सलीको पे,
हर वक्त बस
नाम बदल जाता है ।
तमन्ना ऐ आरजू
जो दफ्न मेरे सीने में,
उनको याद करने में
हर साल गुजर जाता है।
देखता हू आएने में
तो वो नजरें चुराता है।
ख्वाबो की परवाज़ पे
हवा - ऐ - रुख बदल जाता है।
फिर छटपटाई सांसें
हर शख्स छीन जाता है।
मेरी चिराग - ऐ - महफिल में,
बस वक्त गुजर जाता है


--- नरेन्द्र सिसोदिया "साहिल"
---- 2 / jan / 2002
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